सोमवार, 27 सितंबर 2010

‘कुम्भ’ की वैज्ञानिकता’

कुम्भ के अवसर पर पंचपुरी देवनगरी हरिद्वार के गंगा जल में डुबकी लगाने की उद्दाम लालसा आदिकाल से ही भारतीय जन मानस में है। शास्त्रों और पुराणों में ऋषियों ने मुक्तकंठ से इस महापर्व की अर्भ्यथना की है। कुम्भ पर अमृत हो जाने वाले गंगा जल के आचमन के लिए दुनिया भर से आये करोड़ों श्रद्धालु गंगा के तट पर एकत्रित होते हैं। कुम्भ के इसी आध्यात्मिक और सामाजिक महत्व का दिग्दर्शन करते हुए हम योग कुम्भ के संदर्भ में भी विचार करेंगें।
काल खंड की निश्चित अवधि में नैसर्गिक भूखंड पर प्रत्यक्ष प्रवाहित गंगा भावोत्प्रेरक यमुना और अज्ञात विलीन सरस्वती का कुम्भ,अर्द्धकुम्भ और महाकुम्भ के आयोजन में देश और देशान्तर से उपस्थित लोग कर्म,भक्ति एवं ज्ञान की शिक्षा ग्रहण करते हैं।
कुम्भ की उत्पत्ति के विषय में पौराणिक आख्यानों पर दृष्टिपात करें तो कई कथाएं प्रचलित हैं, जिनमें महर्षि दुर्वासा की कथा एवं समुद्र मंथन की कथा का अत्यधिक महत्व है। कथासार के अनुसार देव और दानवों के बीच अमृत से भरे घड़े को लेकर हुए संघर्ष के दौरान दैत्य अमृतपान न कर सकें इसलिए घड़े को लेकर भागे देव पक्ष के लोगों ने चार जगहों पर घड़े को रखकर युद्ध किया था। अमृत जमीन पर गिरा जिसके परिणाम स्वरूप कुम्भ का आयोजन प्रयाग, उज्जैन, नासिक और हरिद्वार में होता है।
कुम्भ की उत्पत्ति के पश्चात 12वर्षों पर इसके आयोजन के पीछे ग्रहों की स्थिति योग को महता दी गयी है। बृहस्पति 12 वर्षों में एक बार बारहों राशियों का भ्रमण करते हैं जबकि सूर्य 12महिनों में अपना परिपथ पूरा करते हैं। जब सूर्य का एक परिपथ पूरा होता है तब माघ महीने का स्नान अमावस्या के दिन होता है। उस दिन चन्द्रमा भी सूर्य की राशि में ही होता है तथा जब बृहस्पति अपना एक परिपथ पूरा कर 12वें वर्ष में वृष में आता है तब यह आयोजन होता है।
इस संदर्भ में वैज्ञानिक धारणा यह है कि सूर्य के भीतर जो रासायनिक परिवर्तन होते हैं उनका क्रम भी लगभग 12वर्ष का ही होता है। जलपूरित घट मांगलिक माना जाता है। आज भी समस्थ प्रकार के पूजन में जल से भरे घड़े का ही पूजन किया जाता है जिस पर समस्त देवों का आह्वान कर पूजार्चन किया जाता है।
कुम्भ घट का पर्याय है, घट देह का पर्याय है जिसमें अमृत रस रूपी आत्मा व्याप्त है। देह-आत्मा का मिलन ही सृष्टि का संयोजन करता है। देह-आत्मा के स्वरूप को जानने के मार्ग अलग-अलग हो सकते हैं जो मोह या अज्ञान से आच्छादित रहता है। इसी ज्ञान की प्राप्ति के लिए भक्ति,कर्म एवं ज्ञान मार्ग का अनुसरण होता है जबकि सभी मार्गों का अन्त ज्ञान में ही होता है। सर्वाकर्माखिलं पार्थे परिज्ञाने सम्पाप्ते (गीता) आच्छादित ज्ञान को देह से आत्मा का संबंध, अद्वैत का ज्ञान ही भारतीय दर्शन का मूल है जिसकी प्राप्ति के लिए वैज्ञानिक निरूपण किया गया। कालान्तर में सर्वे भवन्तु सुखिनःके हितार्थ इसे जोड़ दिया गया।
स्वर्ग-मोक्ष की कामना से देवभूमि हरिद्वार की पावन भूमि पर इतनी बड़ी संख्या में लोगों के एकत्रित होने के पीछे सिर्फ धार्मिक भाव ही है या अन्य कोई वैज्ञानिक कारण भी, यह एक शोध का विषय है।
माघ महीने में अमावस्या के दिन जब सूर्य मकर में एवं बृहस्पति वृष में होता है उस समय पृथ्वी की स्थिति कैसी होती है, क्या उसके गुरूत्वाकर्षण शक्ति में किसी तरह का विक्षोभ उत्पन्न होता है या नहीं यह भी शोध का विषय है।
श्रीकृष्ण द्वैपायन व्यास ने तो पद्म पुराण में यहां तक कहा है कि यदि कोई श्रद्धालु माघ भर स्नान करने में असमर्थ है तो वह मकर सक्रांति,मौनी अमावस्या तथा वसंत पंचमी –इन तीनों पर्वों पर स्नान करके उतना ही पुण्य प्राप्त कर सकता है। यद्यपि 14, 15, 20 और 30 जनवरी 2010, 12, 15, 24 फरवरी और 30 मार्च, 14 और 28 अप्रेल 2010 तक कुल दस स्नान हैं परन्तु 12 फरवरी महाशिवरात्री, 15 मार्च और 14 मार्च बैसाखी के दिन तीन शाही स्नान हैं। लेकिन 14 मार्च को प्रमुख शाही स्नान माना जा रहा है।
इडा-गंगा-चन्द्र,पिंगला-यमुना-सूर्य तथा सुसुम्णा-सरस्वती-अग्नि-अमृत जो इन तीनों नाड़ियों का संगम स्थान है वही कुण्डलिनी शक्ति का मूल स्रोत मूलाधार चक्र तथा मूलबन्ध लगाने का स्थान भी है। इन सभी महाशक्तियों का केन्द्र होने से इसे शक्ति स्थलभी कहा जाता है।
मानव शरीर में स्थित भौहों के मध्य में आज्ञा चक्र को जगाकर अपने शरीर में ही कुम्भ स्नान का लाभ उठा सकते हैं।
कुम्भ स्नान मुक्ति का धाम माना गया है। अपना पूरा ध्यान भ्रूमध्य-आज्ञा चक्र पर ही टिका लें। एक ओर से श्वेतवर्णी गंगा और दूसरी ओर से नीले कृष्ण रंग की यमुना आकर यहाँ मिल रही हैं। ठीक उसी समय सरस्वती भी इस मिलन से संगम के महत्व को बढ़ा रही है।
मनुपुत्र मस्ती में भरकर जय गंगे,जय यमुने और जय सरस्वती बोलकर जब गोते लगाते हैं। जय गंगे-जय यमुने-जय सरस्वते......... जब ध्यान हटा, शरीर पर हाथ रखा तो हाथ कपड़ों पर पड़ा तो बिल्कुल सूखे थे। परन्तु तीनों माताओं ने मनुपुत्र के मन को धो-धोकर इतना पवित्र कर दिया कि मनुपुत्र फिर उसी ध्यान में डूब गया और गोते लगाने लगा। मनुपुत्र निहाल हो गया, यह मानसिक स्नान है, जो वास्तविक स्नान से भी अधिक महत्वपूर्ण है, आनन्ददायी है।
कई बार हम गंगा में वास्तविक रूप से नहा रहे होते हैं,परन्तु मन का स्नान न होने से स्नान का फल नहीं ले पाते। परन्तु इस मानसिक स्नान से ही सभी पापों से मुक्त होकर मुक्ति की ओर बढ़ते हैं। ऐसा योगी ब्रह्माज्ञानी होता है। इसलिए मानव को भ्रूमध्य में मन केन्द्रित कर-प्रभु का ध्यान करना चाहिए।
केन्द्र और राज्य सरकार के तमाम विभागों के अथक प्रयासों ने देवभूमि हरिद्वार के विशाल मेला परिक्षेत्र को सजाया-संवारा है। करोड़ों श्रद्धालुओं को हर संभव सुविधा उपलब्ध कराने के चुनौती पूर्ण लक्ष्य के लिए पूरी सरकारी मशीनरी सालों से युद्धस्तर पर सक्रिय थे। विश्व का यह सबसे बड़ा धार्मिक आयोजन कुम्भ मेला क्षेत्र 130 वर्ग किमी. में फैला हुआ है। इसमें हरिद्वार, ऋषिकेश,मुनि की रेती और स्वर्गाश्रम का क्षेत्र शामिल है। वर्ष 2010जनवरी माह से अप्रैल के मध्य हरिद्वार में पूर्ण कुम्भ मेला में लगभग चार से पांच करोड़ श्रद्धालुओं के स्नान करने की संभावना की जा रही है।
गंगा रक्षा मंच के राष्ट्रीय संयोजक, अध्यक्ष तथा योग ऋषि श्रद्धेय स्वामी रामदेवजी महाराज भारत को विश्व गुरू के पद पर पुनर्स्थापित करने के लिए स्वस्थ भारत, स्वच्छ भारत, जनसंख्या नियंत्रण, स्वदेशी से स्वावलम्बी और शत-प्रतिशत मतदान संकल्प को लेकर अहर्निश कार्यरत हैं। स्वच्छ भारत के परिप्रेक्ष्य में अविरल गंगा, निर्मल गंगा हेतु प्रदूषण से मुक्त कराने के लिए स्वामीजी महाराज ने सैंकड़ों कारसेवकों तथा योग साधकों के साथ हरिद्वार में हर की पौड़ी पर गंगा की सफाई का अभियान चलाया।
श्रद्धेय स्वामीजी का मानना है कि गंगा राष्ट्रधारा का प्रतिनिधित्व करती है। संत भारतीय संस्कृति के संवाहक हैं। अगर गंगा की अस्मिता को बचाये रखना है तो गंगा को प्रदूषित और विलुप्त होने से बचाना है। गंगा को उनके दर्द से मुक्त कराना होगा क्योंकि मोक्षदायिनी गंगा खुद मोक्ष की तलाश में हैं। यह काम संत-महात्मा तथा हम सभी को मिलकर करना है।
18 अगस्त 2008 को कानपुर (उ.प्र.) में स्वामीजी ने कहा था कि भारत को स्वच्छ बनाने की शुरूआत हम गंगा की निर्मलता और अविरलता के ध्येय को सामने रखकर ही कर रहे हैं। क्योंकि गंगा ही निर्मल नहीं होगी तो स्वच्छ भारत की कल्पना ही निराधार है। भारतीय सभ्यता, संस्कृति और सनातन धर्म की किसी भी कीमत पर रक्षा करना ही संतो तथा नागा संतों का परम धर्म है।

रविवार, 26 सितंबर 2010

डॉ. ओ.पी.वर्मा हमसे मिल कर प्रेम विभोर हो गये (यही कुछ पल उनके निवास पर)





विश्वास


उस बादामी शाम में कोई रंगत नहीं थी। पारदर्शी आंखों के किनारे सूख गये और हल्की-फुल्की बूँदाबांदी के बाद सब कुछ जैसे धूलि-धूसरित होकर रह गया। उसे लगा था वह फिर कहीं से ढरक गया है, उसके भीतर कहीं कुछ टूट-सा गया है और मन बिखर गया है। किसी पारे की तरह तरल और अनमना-सा मन। उसने छज्जेदार हवेलियों से झांकती और छतों पर चीलों सी मंडराती कटी हुई आंखों की दृष्टियों से बचकर अपनी पाण्डुलिपि किसी को थमाते हुए कहा-इसे जल्दी ही पढ़ लीजिये। यह मेरी नयी कृति होगी। पढ़ेंगी तो अच्छा महसूस करेंगी। इसमें मेरी कुछ निजी पंक्तियां भी हैं, साथ रहेंगी तो देर तक आपसे बतियाती रहेंगी, मौन मुखर छवियों-सीं और वह अंधेरे की अन्धी गली में आगे कहीं निकल गया, जैसे कई गुमनामी के अन्धेरों में खो गया हो एक मुद्दत के लिए।

फिर वही पीड़ा, फिर वही अहसास और विश्वास के बावजूद अप्रत्याशित शंका वह कितने-कितने पड़ावों से गुजरने के बाद यह मुस्कान चेहरे पे समेटे है जैसे सब कुछ लुट जाने के बाद कहीं कुछ पाने के लिये उसके पास एक विश्वास ही तो रह गया था जिसे वह आज भी संजोये हुए है, किसी कल के लिए। वह प्रसन्न भी है तो किसी सपने को मूर्त रूप देने के लिए। वह आत्मविश्वास की कोई शक्ल और तराशे हुए नख-शिखा की तरह।

फिर एक अतीत सजीव होने लगा जिसका कोई वर्तमान था और एक सुख चित्रांकित हो गया उमर के कैनवास पर। जो जितना दमित होता है, उसका जागरण भी उतना ही प्रखर होता है। उसे लगा, वह कोई नाम है, किसी खोयी हुई पहचान का। दर्द कहीं ठहरने लगा, कोई टीस शब्द में ढलने लगी और आलपिन की नोंक सा कुछ चुभ गया भीतर। उसने सोचा, कितनी अजीब है यह दुनिया और अनायास ही कैसे घट जाता है कोई हादासा। हम दर्द के संगाती होते तो डूब जाते किसी अतीत के धुंधलके में मन का दुःख चुपचाप ही सहा जाता है, किसी से कहा नहीं जाता। उसे ध्यान आया, वह कभी-कभी उसके दृष्टिबन्ध में आ जाया करती थी और वह सोचता था। काश, वह खोये हुए दिनों में कभी कहीं मिली होती तो उसका जीवन ही उबर जाता।

नाम तो याद नहीं, उसका जीवन एक सीधी लकीर सा था जिसे कोई चाहता तो चित्र का रूप दे सकता था और चाहता तो गहरा कर ऐसी आकृति में ढालता जैसी कभी देखी न गयी हो। हुआ यह कि वह आकृति बनने से पूर्व ही आकृति विहीन होने लगी। छोटी वय में विवाहित होने के साथ ही वह किसी बड़े पहाड़ जैसे दुःख की भागीदार बन गयी। सुहाग का अर्थ तक समाप्त हो गया तब उसे पता लगा कि उसका पति दो शादियां करने के बाद किसी का पति नहीं कहा जा सकता और वह सम्बन्ध क्या जिसमें दम्पत्ति की कोई आकांक्षा शेष न रह जाये। वह ब्याहता होकर भी कुमारी ही रही। वर, ससुराल, सुहाग-सिन्दूर जैसे शब्दों के मन टटोलने के बाद भी उसे कुछ नहीं मिला, एक भूल के अहसास के सिवा।

वह कोई तेरह वर्ष की रही होगी कि उसकी देह पर हल्दी चढ़ायी गयी और वह स्वर्णिम आभा के साथ उजलने लगी। रूप में निखार आते ही उसे अंजाने हाथों में चले जाने का भय सालने लगा। वह शादी का अर्थ ही नहीं जानती थी। वह सिहर उठी किसी शंका के साथ। उसने ससुराल की देहरी लांघकर पिता के घर लौट आने में ही अपना भविष्य समझा। दो व्याहताओं के पति में पति जैसा क्या रह जाता है सामीप्य के लिए...।

वह घर लौट आयी अपूजित वस्तु की तरह, किन्तु उसने खण्डित देवता के चरणों में चढ़ना पसन्द नहीं किया। वह पूजा-सी पवित्र रहना चाहती थी किसी सम्बल के साथ, यह सोचकर कि उसका भी कोई देवता होगा, वह देहरी, अहसास, समर्पण और कशिश के साथ जिन्दगी जी सकेगी और उसे भी वह सुख-सम्मान मिलेगा जिसके बारे में वह बचपन में सोचती रही है।

नैहर लौट आयी तो पिछले कुछ दिनों का समय पांवों की गति के साथ चला। वह टूटती-बिखरती रही बेवजह की हकीकत के बाद। उसने निश्चय किया कि भले ही वह अनिश्चय की देहरी तक रहे, वह अपने ऋण से उऋण न हो या उसे वह सब न मिले जैसा वह चाहती है, किन्तु वह उस कगार पर खड़ी नहीं होगी जहां पांव धरती में धंसते चले जाते हैं। वह अतीत को कभी नहीं दोहरायेगी। वह कोई नुमाइश की चीज नहीं जिसे जी चाहे देखे और कहे दुनिया की नुमाइश में ऐसे खिलौने भी होते हैं। खिलौने, जो सजने से पहले ही टूट जाय या जिनकी कोई उम्र ही न हो।

फिर वह अपने पांव चलने लगी और अतीत का हर लम्हा उसके पांवों को थकान देता रहा। जैसे किसी ने कहा हो, ब्याह किया है तो ससुराल में ही रहना होगा और वर का क्या! भाग्य से जो मिल जाये, जैसा बदा हो।

वह बिलख-बिलखकर रो पड़ी। विवशता कैसे तोड़ देती है नारी और उसके सपने को, उसने पहली बार महसूस किया। तभी किसी ने कन्ध छुआ-तुम ब्याहता हो, पति को छोड़ भी दोगी तो कौन ब्याहेगा तुम्हें, अभी समाज इतना आगे नहीं है और पिछड़े को आगे लाना कोई नहीं चाहता। सुना, अकेली रहोगी तो क्या गिद्धदृष्टियां नहीं नोंच खायेंगी तुम्हें।

यहां वह समझौता कर सकती थी, किन्तु उसने ऐसा नहीं किया। वह आत्मबल के साथ अपने पांवों चलने लगी। पहले उसने अपने को शिक्षित किया, किन्तु संघर्ष-यात्रा के पूरे होते-होते पिता का साया सिर से उठ गया, और वह रह गयी अकेली, किसी अधूरे वाक्य सी, अर्धविराम-सी।

समय हवा के पंखों पर उड़ चला। ऋतुएं रंग लिये आयी तो उनकी झांईं से वह खड़ी होने लगी और एक दिन सूरज उसके द्वार भी आया। सूरज की अगवानी के लिए वह द्वार खोलने लगी कि देखा किरणें खिड़कियों के रास्ते से भीतर आ गयी हैं। उजाले का हाथ गहते ही वह सबल हो उठी। उसने मेहनत से अपने को स्वावलम्बी बनाया, किसी का अहसान उसने कभी नहीं लिया। वह दूसरे के लिए सम्बल बनी।
उसने अतीत को व्यतीत समझकर काट दिया, यह सोचकर कि जो अंग नासूर बन जाये उसे काट दिया जाना चाहिए ताकि वह दूसरे अंगों में तो नहीं फैले। वह जिन्दगी के नये सफर के लिए नये मुकाम तलाशने लगी। शान्त-स्निग्ध कविता के मूल और अनुवाद के शब्दार्थ-सी।

वह हर बार नये उत्साह के साथ मिलती और उसे लगता निश्चय ही उसका कोई गन्तव्य होगा। वह आने वाले कल के लिए आज जैसी नहीं रहेगी और यदि उसने एक क्षण भी जिन्दगी को अपनी तरह जी लिया तो उसे कोई शक्ति नहीं तोड़ सकती।

उसकी कहानी बाल-विवाह और तलाक के बाद भी एक धरावाहिक कहानी है जिसका छोर कोई नहीं जानता। वह किसी संकल्प को जरूर मूर्त रूप देगी। वह जरूर विहंस-विहंस उठेगी किसी आभा के साथ।
एक दिन वह रास्ते में मिली तो बतियाने लगी थी, आप बहुत अच्छा लिखते हैं। आपकी कुछ कहानियां मैंने अपने लिए भी रख लिये हैं। मैं आपकी दूसरी रचनाएं भी पढ़ना चाहूँगी। उन्हें पढ़ने में मुझे लगता है, मेरा भी कोई जमीर है और मुझे उसके लिए जीना है।

उसे लगा, वह मामूली लड़की नहीं है। अब उसे किसी सहारे की भी जरूरत नहीं। वह साहसी और संकल्पी है। कामकाजी महिला की सभी खूबियाँ हैं उसमें। वह किसी आसमान को प्रकाशमान करेगी, किसी जमीन पर उंगलियों के फूलों से नाम लिखेगी और उसके जीवन में कोई दूसरा प्रकाश दीप अवश्य आयेगा।

तभी मानस में पंक्तियां कौंध गयीं- खुशियां थी चार दिन की, आंसू हैं उम्र भर की, तन्हाइयों में अक्सर रोयेंगे याद करके, जैसी पंक्तियां कितनी गलत हो गयी है यहां। कैसी कहर, कैसी रात कैसी बारात और कैसा जनाजा, सब शाब्दिक बातें हैं। सत्य है तो इतना ही कि कोई एक क्षण है जो सब कुछ छीन लेता है और चाहे तो वह सब कुछ दे देता है, वह सब भी जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती। वह उसी एक क्षण की विश्वास है।

फिर हवा के एक झोंके ने आ दबोचा- तुमने वह क्षण देखा है।

देखा तो नहीं, महसूस जरूर किया है। समाज से बहिष्कृत, परिवार से उपेक्षित-तिरस्कृत और सुविधओं से वंचित रहने के बावजूद मैं आज भी किसी इकाई के साथ स्थापित हूँ। यह उसी क्षण की देन है।
तो फिर एक क्षण लिख दो ना उसके नाम।

कल प्रार्थना क्षणों में से कोई एक क्षण चुनकर रखूंगा उसके लिए। मैं उसे सुखी देखना चाहता हूँ और इतना सम्बन्ध तो होता ही है लेखक और पाठिका में।

दूसरे दिन प्रार्थना करके उठा तो देखा द्वार के सामने वही नाम उसी शक्ल में गुजर रहा था, जैसे कोई रोशनी की लकीर लम्बी हो गयी हो।

पुनर्जन्म

जब हाईस्कूल का परीक्षाफल निकला तो मुझे हर विषय में बहुत अच्छे नंबर मिले थे, जिले मैं प्रथम आयी थी। उस समय बुआ ने कहा था-भाभी’! तुम्हारी पुष्पा मेधवी है, तुम्हारी और जिस घर में जायेगी दोनों घर का नाम रोशन करेगी। यह तन और मन दोनों से सुन्दर है। इसके पंखुडियों जैसे नर्म होंठ, लम्बी नाक, घने बाल, लम्बा कद, गोरा रंग इसकी खूबसूरती में चार-चांद लगाते हैं। इसकी शादी में कोई परेशानी ही नहीं आयेगी।

एकांत प्रिय पुष्पा की कई खूबियां थीं, लिखने, और संगीत सुनने का उसे बेहद शौक था। समय पंख लगाकर उड़ता गया, पुष्पा भी अपनी मंजिल की ओर बढ़ने लगी। विश्वविद्यालयी पढ़ाई में भी वह हमेशा आगे रहती थी। अंत में उसने अपने विभाग में टाप करके, गोल्ड मेडल भी प्राप्त किया। टापर होने की वजह से उसे बिहार में वैज्ञानिक की नौकरी मिल गयी।

जैसे हर जवान लड़की के मन में सतरंगी सपने पैदा होते हैं, वैसे सपने पुष्पा के मन में भी पलने लगे लेकिन शर्मीली पुष्पा व्यक्त नहीं करती थी क्योंकि संयम और लज्जा पुष्पा का गहना था।

शादी की मंड़ी में अप्रवासी भारतीय एक सामयिक विषय है। (अमरीका) में बसे एन.आर.आई. लड़कों के प्रति भारतीय, खासकर पंजाब की लड़कियों के माँ-बाप का आकर्षण और एन.आर.आई. लड़कों द्वारा पंजाबी लड़कियों को विलायत, अमेरिका ले जाकर उनका अपमान और शोषण एक ज्वलन्त समस्या है। ऐसे मामलों की संख्या हजारों में है इतने हजार कि भारतीय राष्ट्रीय महिला आयोग को अलग से एक एन.आरआई. सेल का गठन करना पड़ा। अपने बिगड़े हुए आधे देशी और आधे अमेरिकी लड़कों को राह पर लाने के लिए उनके पुरातन पंथी बाप पंजाब तथा देश के अन्य प्रांतों से लड़की को चुन लाते हैं। जो अमरीका में नौकरीनुमा जीवन व्यतीत करती हैं और कुछ दिन बाद बिगड़े हुएपति द्वारा पिटकर या जला कर उसकी कहानी का अंत हो जाता है।

पुष्पा देखने में सुन्दर तो थी ही, गुणी और कमाऊ भी थी। जिससे तमाम रिश्ते आने लगे। ऐसे में एक एनआर. आई. लड़के के बाप ने भी जोर-आजमाइश शुरु कर दी। पुष्पा के आफिस में जाना, उसके पिताजी से बात करना, पीछे ही पड़ गया वह पुष्पा के पिताजी को भी लगा कि इससे अच्छा रिश्ता नहीं मिलेगा, उन्होंने भी हामी भर दी। बिगडैल लडके को अमेरिका से बुलाकर शादी कर दी गयी।

दिल की अच्छी पुष्पा ने सोचा कि अब जिन्दगी को सलीके से जिया जायेगा लेकिन जो ईश्वर को मंजूर होता है वही होता है। शादी के बाद लड़के को अमेरिका जाना था वह गया और अकेला छोड़ गया नवविवाहिता पुष्पा को। पढ़ी लिखी अच्छे समझवाली पुष्पा अमेरिका जाना चाहती थी, वह नहीं ले जाना चाहता था लेकिन अब वह अमेरिका गयी तब उसे मामला समझ में आने लगा कि जनाब का गोरी मेम के साथ चक्कर हैं।

फिर भी परिस्थितियों से समझौता करके पुष्पा ने बात को संभालना चाहा दोनों के प्रेम का फल लड़केके रूप में मिला। पुष्पा ने सोचा कि अब सब कुछ ठीक हो जायेगा लेकिन स्थितियां दिनों-दिन बद से बदतर होती गयीं।

प्रतिदिन सुबह-शाम रवि और पुष्पा के बीच घमासान वाकयुद्ध चलता। आखिर बातों ही बातों में पुष्पा ने रवि से कहा कि रोज-रोजके झगड़े से तो अच्छा है कि आज फैसला ही हो जाय। जब हमारे विचार आपस में नहीं मिलते, जब तक आप के उपर पश्चात्य सुंदरी का जादू चल रहा है, हम लोग एक छत के नीचे शांति से नहीं रह सकते, जबरदस्ती एक दूसरे के साथ नहीं रहा जा सकता।

रवि ने कहा-तुम्हें रोका किसने है’, जल्दी फैसला करो और मुझे छुटकारा दो....... मैं भी यही चाहता हूँ कि अब तुम्हारे और मेरे संबंध सदा के लिए खत्म हो जायं।

रवि, पुष्पा में झगड़ा होना कोई नयी बात नहीं थी परन्तु आज तो सारी हदें ही टूट गयीं तो पुष्पा ने भी निश्चय किया कि रवि से तलाक लेकर अकेले ही जीवन यापन करुंगी। मिले हैं जख्म तो अपने मसीहा बन जाओं, तुम्हारे वास्ते पैदा ईशा नहीं होगा।

व्यथित मन से पुष्पा, रवि के जिन्दगी से दूर-बहुत दूर चली गयी, रवि प्रसन्न था कि चलो अब अमेरिकन लड़की से शादी करने में कोई अड़चन नहीं होगी। पुष्पा सोच रही थी उसने अपने जीवन के स्वर्णिम समय को एक गलत आदमी के साथ गुजारा इसके बदले में क्या मिला?

प्रतिशोध के तेवर पुष्पा के मस्तिष्क में भूचाल उत्पन्न करने लगे। नारी व्यथा उसके हृदय को बींधने लगी। उसका चिंतन भावनाओं से उबरकर आम नारी की स्थिति का आकलन करने लगा। उसने निश्चय किया कि वह शादी नहीं करेगी जिस दलदल से वह अभी निकली है उस दलदल में फिर नहीं फंसना चाहती इसलिए जीविकोपार्जन करती हुई असहाय और बेवश महिलाओं के लिए काम करेगी जो दुष्ट पुरुषों से सतायी जाती हैं।

चुनौतियों के भंवर में फंसी पुष्पा अपनी और अपनी जैसी स्त्रिायों की अस्मिता की रक्षा के लिए लेखिकाके रूप में आगे आयी। पहले उसने अपने आपको अमेरिकी समाज में इज्जत से खड़ी होने के लायक बनाया क्योंकि अमेरिकी परिवेश में तो तलाक को गम्भीरता से नहीं लिया जाता परन्तु भारतीय परिवेश में पली-बढ़ी पुष्पा के लिए यह बड़ी बात थी क्योंकि भारत में नारी माता है, पत्नी है। नारी करुणा है, ममता है। नारी रोशनी है, भावना है, बेबसी है। नारी धारित्री है, खुश्बू है। जिसकी जीवन ही साधना है। नारी जिसने पुरुष को सदा दिया है, मांगा कुछ नहीं। चाहा है प्रेम, मगर पाया है दहशत के अभ्रभेदी पहाड़ों का सिलसिला, हलाल की चीत्कार जैसा लम्बा अतीत। फिर पुष्पा सोचने लगी कि नारी प्रकृति है, जननी है, जगत को उसने जना है। पुरुष को उसीने पैदा किया है अपने गर्भ से। रक्त से सींच-सींच कर पाला है। उसी की शक्ति से पुरुष में शक्ति का संचार हुआ, पौरुष जगा और उसने इस पौरुष को नारी पर ही आजमाया।

मद में चूर पुरुष ने नारी को कामिनी (काम को जगाने वाली), रमणी (रमण करने वाली) तथा प्रमदा (प्रमाद देने वाली) कहा। पुरुष ने अपनी जननी को ही गंदी-गंदी गालियाँ दी, उत्पीड़ित किया, फिर भी नारी घुट-घुटकर जी रही है, सृष्टि रच रही है आखिर वह प्रकृति है न। नारी ने पुरुष से कभी घृणा नहीं की, उसके अत्याचार सहे। एक जमाना था जब भारत की धरती पर नारियों का ही अधिकार था। समाज में  मातृसत्तात्मक व्यवस्था थी। नारियों को उनके वैध अधिकार प्राप्त थे।

मुगलों के शासनकाल में नारियों की दयनीय स्थिति के बारे में सोचकर पुष्पा कांप गयी-अर्ब्दुर रहीम खान खाना के पिता बैरम खाँ के अनुसार-रईस को चार बीबियां रखनी चाहिए। बातचीत के लिए इरानी, सेज के लिए हिन्दुस्तानी, खाना बनाने के लिए तुरानी और पिटाई के लिए खुरासानी ताकि उसकी दुर्गति होते देखकर बाकी तीनों बीबियां खौफ खाएं। पूंजीवादी देश यू.एस.ए. में निवास कर रही पुष्पा ने देखा की पूंजीवादी समाज में तलाक बहुत होता है, पूंजीवाद मनुष्य को अकेला बनाता है, पूंजीवादी देशों में जब चाहा शादी जब चाहा तलाक हो जाता है। इसलिए यहाँ बच्चों की देखभाल ठीक से नहीं हो पाती है। तलाक के बाद अकेलापन हो जाता है। इसलिए फ्रांस, अमेरिका, ब्रिटेन आदि पूंजीवादी देशों में अनिद्रा के रोगियों और पागलपन के मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ रही है।

भारतीय समाज संयुक्त परिवार की व्यवस्था पर टिका है। आज संयुक्त परिवार टूट रहे हैं। प्राचीन भारतीय समाज में स्त्री पुरुष में समन्वय था, इसलिए प्यार था। पति-पत्नी आजीवन एक दूसरे के साथी बनकर रहते थे। आज पति-पत्नी एक दूसरे के जरुरत बन गये हैं इसलिए अपनापन, विश्वास और प्यार खो रहे हैं। महिलाएं ही पुरुषों को संगठित समाज देने का सपना साकार करती हैं।

पुरुष रचित समाज में पुष्पा चट्टान की तरह खड़ी स्त्री अस्मिता के लिए संपत्ति, सत्ता और स्वाभिमान की मौजूदगी के साथ स्वविवेक से फैसला लेकर सभी कार्य को अंजाम देती चली गयी। भारतीय सामाजिक छटपटाहट की बंदिशों को तोड़कर अपने कार्य और विचारों को गति देने लगी। अपने लड़के के परवरिश का भी बोझ उसके कोमल कंधों पर है। लेकिन पुष्पा, जीजाबाई की तरह अपने पुत्र की परवरिश भी कर रही है।

स्वावलम्बी पति-पत्नी के बीच पनपते वैचारिक मतभेद से पुष्पा अपनी सामाजिक, धर्मिक स्थिति के जिस बिन्दु से जिस यथार्थ को समझ पाती, उस विशिष्ट संवेदना को जकड़ पाना स्त्री के अलावा किसी और के बूते की बात नहीं। स्त्री के पुराने अर्थों और संदर्भों को पलट कर स्त्री के आधुनिक जटिल होती संवेदना को उकेरती हुई पुष्पा आगे बढ़ने लगीं। भारतीय और अमेरिकी दोनों संस्कृतियों में तालमेल बैठाती पुष्पा चुनौतियों की मंजिल पर अकेली चलती गयी।

भारतीय और वैश्विक समाज का परिवेश बदला तो यथार्थ की जटिलताएं और स्त्री जीवन की चुनौतियां भी बढ़ीं। पुष्पा की राहों में भी काफी जटिलताएं और चुनौतियां आयीं लेकिन उसने डटकर उसका मुकाबला किया इसलिए उसके सभी बंद रास्ते खुलते गये। परम्परागत पुरुषवादी फ्रेम को तोड़कर पुष्पा स्त्री के भीतरी व्यक्तित्व को पूरी निडरता से खोलती है। इससे उसका आत्मविश्वास और आत्म सम्मान की लौ प्रज्जवलित होती है। अपने सिद्धान्त और सच के लिए वह कोई भी समझौता नहीं करती, यही उसकी विशेषता है।

भारतीय परिवेश में दहेज हत्या, बलात्कार, पारिवारिक हिंसा, लिंग परीक्षण और परित्यक्ता, तलाकशुदा
स्त्रियों से जुड़े मुद्दों पर पुष्पा शिद्दत से लिखती है।

आज ग्लोबलीकरण के दौर में भारत और यू.एस.ए. में कमाऊ स्त्रियां भी अनकहे समझौते और दोहरे कार्य से ग्रस्त है। पुरुष सत्ता की जड़ें इतनी गहरी धंसी हैं जिन्हें तोड़ना या बदलने के लिए लम्बी लड़ाई लड़नी होगी। आज पुष्पा पूरे दमखम के साथ स्त्री के अनछुए पन्नों को बेबाकी से खोलने में लगी है। वह अपनी कर्मठता और जुझारूपन और जीवट्ता से खोए हुए वजूद को पाने लिए संघर्ष कर रही है। परदेश में रहकर भी देश के संस्कृति की महक पश्चिमी देशों में फैला रही है पुष्पा।

यू.एस.ए. में बसी पुष्पा जब अमेरिकी महिलाओं के बारे में सोचती है कि यहाँ की स्त्रियां भी घर और आफिस दोहरी जिन्दगी जी रही हैं। परन्तु अमेरिकी महिलाओं में दूसरों के बच्चों को अपनी कोख में पालने (सरोगेट मदर) की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है। अमेरिका में पिछले साल तक सरोगेट बर्थ की संख्या 1000 थी यह संख्या तेजी से बढ़ रही है। यहाँ इसको गलत नहीं समझा जाता लेकिन भारतीय दृष्टिकोण से देखने पर यह गलत है। ये स्त्रियां अपना घर बसाने के बाद पैसे के लिए अपना कोख बेचती है -यह कैसा मातृत्व है?

अमेरिका तथा भारत जैसे सामंती-पूंजीवादी समाज में नारी समाजवादी मूल्यों को अपना कर ही स्वतंत्र और आत्मनिर्भर रह सकती है। स्त्री-पुरुष एक साथ रहकर श्रम के सहयोग के आधार पर सामाजिक सहजीवन जी सकते हैं।

पुष्पा के जीवन में पश्चिम के क्षितिज पर एक नया सूरज उदय हो गया। पुष्पा अपने कमरे से नीचे देखती है तो उन क्यारियों में भी वसंत अंगडाई लेने लगा है जिसमें एक लम्बे समय से पतझड़ का साम्राज्य था। अब तो सम्पूर्ण यौवन को अपने में समेटे रजनीगंधा भी खिलखिलाकर हंसने लगी है। पुरानी जिन्दगी को पुष्पा कब की भूल चुकी है। क्या भूल क्या याद करुँ, यह तो मेरा पुनर्जन्महै। यह नया जन्म स्त्री अस्मिता को बचाने के लिए ही हुआ है। दुनिया में मेरा सब कुछ छिन गया लेकिन फिर से मैंने नयी दुनिया बसा ली है, पूरा विश्व ही मेरा कुटुम्ब है। इन्हीं सब भावनाओं में पुष्पा डूबती-उतराती रही क्योंकि आज उसका जन्म दिनहै। तभी बेटे ने कहा मम्मी! मेहमान आ गए।तब उसकी तन्द्रा टूटी।

बुधवार, 8 सितंबर 2010

योग और अन्य

निबंध

भारत का मुक्ति संघर्ष और चौरी चौरा कांड
आजादी के दीवानों के जंग की दांस्ता है चौरी चौरा कांड

राष्ट्रीय आंदोलन की पृष्ठभूमि में क्षेत्रीय इतिहास की महत्वपूर्ण भूमिका है। वस्तुतः क्षेत्रीय इतिहास की वह मूल आधर है जो राष्ट्रीय इतिहास को स्वर देता और मुखर करता है। इस दृष्टि से देखा जाय तो भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में पूर्वांचलका योगदान किसी से कम नहीं है।

चलिए चलते हैं एक ऐसे ध्रोहर की ओर जहां से भारत के मुक्ति आंदोलन की दिशा ही बदल गयी थी। यह ऐतिहासिक स्थल है चैरी चैरा। उत्तर प्रदेश जिले में गोरखपुर जिला से देवरिया मार्ग पर 25 किमी. दूर चैरी चैरास्थित है। चैरी चैरा काण्डको जानने के पहले वह जानना काफी जरूरी हो गया है कि चैरी चैरा कांडक्यों हुआ?

बात मार्च 1919 की है, जब महात्मा गांधी ने अहिंसक राज्य क्रांतिका शंखनाद किया था। सन् 1920 में गोरखपुर में बाले मियां के मैदान में विशाल जन समूह को सम्बोधित करते हुए गांधी जी ने कहा कि- विदेशी वस्त्रों और अंग्रेजी पढ़ाई का बहिष्कार किया जाय। चर्खे से सूत कातकर कपड़ा बनाकर पहना जाय तो अंग्रेजों को यह देश छोड़ने में देर नहीं लगेगी।

उस समय गोरखपुर एक ऐसा जिला था जिसमें कांग्रेस संगठन नीचे से ऊपर तक मजबूत और पूर्ण था। यहां ताड़ी, शराब, गांजा और विदेशी कपड़ों की दुकानों पर सत्याग्रह शुरू किया गया।

इसी क्रम में सहजनवां (गोरखपुर जिले का एक हिस्सा) और चैरी चैरास्थित प्रमुख बाजारों में सत्याग्रह चलाने का निश्चय किया गया। चैरी चैरा उस समय विदेशी कपड़ों का बहुत बड़ा बाजार था। यहां सत्याग्रह शुरू करने के लिए कापफी तैयारी की गयी थी। शराब, ताड़ी तथा विदेशी कपड़े की दुकानों पर वहां समाज सेवकों के जत्थों ने दो महीने तक धरना दिया। जमींदारों की मदद से पुलिस वाले इन पर लाठियां बरसाते थे। रिसाल से घोड़े मंगवाये गये, घोड़ों की टापों से कुचल जाने पर भी सत्याग्रहियों ने न तो साहस छोड़ा और न आतंकित हुए।

इस क्षेत्र के सत्याग्रह के सूत्रधर पंडित मोतीलाल नेहरू थे। उन्होंने आदेश दिया कि सत्याग्रही छोटे-छोटे जत्थे में जायें। जब एक जत्था पिट जाय तभी दूसरा जत्था आगे जाय। बाजार के दिन दो शनिवार यह क्रम चला।

4 फरवरी 1922 को तीसरा शनिवार पड़ता था। बड़ी तैयारी के साथ सत्याग्रही चैरी चैरा भेजे गये। यह निश्चय किया गया कि चाहे कितना भी अत्याचार क्यों न हो, पीछे नहीं हटा जायेगा। उस दिन 400 के लगभग स्वयंसेवक अलग-अलग जत्थों में बंट गये।

ब्रह्मपुर स्थित कांग्रेस कार्यालय से सत्याग्रहियों को चैरी चैरा के लिए प्रस्थान कराया गया। ज्यों ही पहला जत्था चैरी चैरा थाने के सामने पहुँचा त्यों ही सशस्त्र सिपाही, चैकीदार और घुड़सवार उन पर टूट पड़े। पुलिस कर्मियों ने स्वयंसेवकों के पहले जत्थे को मारपीट कर घायल कर दिया। अपने साथियों को घायल देखकर किसी ने खतरे के संकेत वाली सीटी बजा दी। खतरे की सीटी सुनकर बाकी बचे स्वयंसेवक भी वहां पहुँच गये। स्वयंसेवकों को आता देखकर पुलिसवालों ने उन पर गोलियां चलानी शुरू कर दी। गोलियों की आवाज और घायलों की कराह ने एक दुःखद माहौल पैदा कर दिया।

गोलियों की वर्षा से कई सत्याग्रहियों ने वहीं पर दम तोड़ दिया। घायल साथियों को देखकर स्वयंसेवकों का क्रोध भड़क गया। पुलिस की गोलियां भी समाप्त हो गयीं। गोली समाप्त होने पर पुलिसकर्मी जान बचाकर थाने के भीतर छिप गये। इसी बीच किसी ने मिट्टी का तेल डालकर थाने में आग लगा दी। अंदर छिपे पुलिसकर्मी और दारोगा जलकर राख हो गये।

जो लोग निकलकर भागने का प्रयास करते उन्हें भी पकड़कर सत्याग्रही आग में डालते गये। इस घटना में दारोगा की गर्भवती पत्नी बच गयी। चैकीदार समेत 23 पुलिस कर्मियों को अग्नि-समाधि दी गयी। इस घटना से महात्मा गांधी ने विचलित होकर सत्याग्रह आंदोलन बीच में ही स्थगित कर दिया।

गांधी जी द्वारा असहयोग आंदोलन वापस लेने पर सुभाष चंद बोस ने कहा- जब जनता का जोश उबाल पर था ऐसे समय पीछे हटने का बिगुल बजा देना पूरे राष्ट्र के लिए बहुत बड़ी दुर्घटना थी। महात्मा जी के प्रमुख सहायक देशबंधु चितरंजन दास, मोतीलाल नेहरू, लाला लाजपत राय सबके सब जेल में थे। सामान्य जन जीवन की तरह वे लोग भी इस निर्णय से काफी नाराज थे।

क्या चैरी चैरा कांड ने महात्मा गांधी के अरमानों पर पानी फेर दिया था या स्वयं गांधी जी इस ऐतिहासिक घटना का आकलन करने में चूक गये थे। यह सवाल आज भी अनुत्तरित है। परन्तु यह बात सच है कि इस घटना ने आजादी के लड़ाई का नक्शा ही बदल दिया था। चैरी चैरा में हुई हिंसा गांधीजी को बर्दाश्त नहीं हुई। उनका कहना था कि अहिंसात्मक आंदोलन के लिए उनकी आशा के अनुरूप देश की जनता तैयार नहीं है। ऐसी दशा में आंदोलन छेड़ना हिमालय जैसी भूलहोगी।

चैरी चैरा में जला पुलिस थाना के पास में बनी मजारें उन पुलिस कर्मियों की हैं जो थे तो हिन्दुस्तानी परन्तु उनके दिलों में राष्ट्र का जज्बा नहीं था। इन मजारों को देखकर उनकी याद तो आती है लेकिन राष्ट्रभक्त के रूप में नहीं, ब्रिटिश हुकूमत के नुमाइंदों के रूप में। यही रेलवे लाइन के उस पार बना शहीद स्मारकगगन की तरफ इशारा करके देश पर शहीद स्वयंसेवकों की याद दिलाता है।

इस कांड के बाद ब्रिटिश शासन ने आस-पास के क्षेत्र में हिंसा का नग्न तांडव मचाया। राजद्रोह का आरोप लिये इस क्षेत्र के लोग वर्षों तक तमाम प्रकार का कष्ट और सजा भोगते रहे। अंग्रेजों ने सुनियोजित ढंग से एक मुकदमा चैरी चैराकेस के नाम से सैकड़ों लोगों पर चलाया।

इसमें 192 लोगों को  फांसी की सजा हुई। मुकदमें के दौरान 232 लोगों का चालान किया गया। जिसमें 228 लोग सेशन को सिपुर्द किये गये। उनमें से दो लोग बीच ही में मर गये। एक व्यक्ति के ऊपर से मुकदमा ही हटा लिया गया। 225 व्यक्तियों का फैसला किया गया जिसमें 192 व्यक्तियों को फांसी की सजा, दो को दो-दो वर्ष की सजा और शेष लोगों को आजन्म कालापानी की सजा दी गयी।

इस फैसले के विरुद्ध मदन मोहन मालवीय एवं पंडित मोतीलाल नेहरू ने हाईकोर्ट में अपील की। जिसमें 38 व्यक्तियों को आजन्म जेल एवं 19 व्यक्तियों को  फांसी की सजा सुनायी गयी। यह निर्णय 23 अप्रैल 1923 को सुनाया गया था और पहली जुलाई को सजा पाने वाले की प्रार्थना स्वीकार कर ली गयी। दो जुलाई 1923 को सभी 19 सत्याग्रहियों को  फांसी की सजा दी गयी। इन शहीदों के शव को खद्दर में लपेटकर स्वयंसेवकों ने अंतिम संस्कार किया। आजादी के दीवानों के जंग की दास्तां है चैरी चैरा कांड

चैरी चैरा काण्डमें शहीद पुलिसकर्मी जिन्हें थाने में जिन्दा जलाया गया था, उसी थाना के जगह पर कई लोगों की समाधि – गुप्तेश्वर सिंह (थानाध्यक्ष), पृथ्वीपाल सिंह सहायक थानेदार, मोहम्मद वंशी खां (प्रधन लेखक), रघुवीर, रामलखन सिंह, विश्वेश्वर राम यादव, गदाबक्श खां, कपिल देव सिंह, लखई सिंह, हसन खां, मोहम्मद जमां खां, मगरू चैबे, रामबली पांडेय, जगदेव सिंह, जगई सिंह, मोहम्मद जकी, इन्द्रासन सिंह, मरदाना खां (सभी सिपाही), वजीर घोसई, जकई, कतवाहरू राम (सभी चैकीदार) खपरैल के थाने में पुलिसकर्मियों के साथ थाने के सभी अभिलेख जलकर नष्ट हो गये।

1922 में सत्याग्रहियों ने थाने को अपने कब्जे में लेकर इस पर 24 घंटे तक तिरंगा लहराया था। आजादी का गीत गाकर प्राणोत्सर्ग करने वाले वीर स्वतंत्रता प्रेमी अपने नाम और यश के लिए काम नहीं किये। अगणित शहीद अनाम हैं, जिनकी आरती उतारना, उनके प्रति नमित होना हमारा कर्तव्य है। इन शहीदों के गीत पावन गाता है सूर्य की प्रभाती रश्मियां उनका वंदन करती हैं। शहीदों की स्मृति में स्थापित कीर्ति स्तम्भ पर शुभ्र चांदनी अपनी निरभ्र और शीतल छाया से उनका यशगान करती है। पीढ़ियां गर्व से इन अमर शहीदों का नित्य स्तवन गान करेंगी। देशभक्ति से ओतप्रोत भावी संततियां उनका निरंतर स्मरण, मातृभूमि और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए प्रेरणा, शक्ति और संकल्पभाव ग्रहण करेंगी।

मीनार की इस नींव में उनकी साधें खोयी हैं। नेतृत्वों की जड़ें, इनकी लहू से धोयी गयी। आजादी के बुर्ज उठे हैं, उनके उत्सर्गों पर, इसके कण-कण में उनकी कुचली साधें सोयी हैं उनके पवित्र स्थल पर हम सभी साध्य दीप जलायें। उनके रक्त से सींचें पथों, मैदानों में मंडराएं।

दूसरा कीर्ति स्तम्भ जिन शहीद कांग्रेसी सत्याग्रहियों की याद दिलाता है वे हैं- दुध्ई पुत्र राम समुझावन (ग्राम चैरी), कालीचरन पुत्र निर्गुन कहार (ग्राम चैरा), आदि दर्जनों लोग हैं।

जिला स्वतंत्रता संग्राम शहीद स्मारक समिति द्वारा आयोजित पूर्वांचल स्वतंत्रता संग्राम सेनानी सम्मेलन के अवसर पर चैरी चैरा काण्ड की 60वीं वर्षगांठ, 6 फरवरी 1982 तद्-नुसार माघ शुक्ल त्रयोदशी, शनिवार संवत 2038 को प्रधनमंत्री श्रीमती इंन्दिरा गांधी ने शहीद स्मारक का शिलान्यास किया था।

19 जुलाई 1993 में भारत के प्रधनमंत्री पी.वी.नरसिंह राव और उत्तर प्रदेश के राज्यपाल मोतीलाल वोरा ने शहीद स्मारक चैरी चैरा का लोकार्पण किया।

इन बलिदानियों के लहू के एक-एक बूँद की शक्ति अपरम्पार थी। वे स्वयं शहीद हो गये और देश के स्वतंत्रा होने का स्वप्न साकार कर गये। यदि हमारे देश के महान क्रांतिकारी स्वतंत्रता के लिए अपने प्राणों की आहुति न देते तो अंग्रेजी राज्य का जुआ हमारे कंधों पर धरा ही रहता।

1857 में जो स्वतंत्रता संग्राम शुरू हुआ, उसका अंत 15 अगस्त 1948 को आजादी मिलने पर ही हुआ। इन सौ वर्षों के महासंग्राम में अनेक वीरों ने हिस्सा लिया। कुछ का नाम तो इतिहास के पन्नों में दर्ज है। शेष खरिज है। ये सब कुर्बानियां जितनी तब प्रासंगिक थीं, उतनी आज भी हैं। उनके सामने देश की स्वतंत्रता का प्रश्न था और आज देश की रक्षा का प्रश्न है। शहीद स्थल पर स्थित संग्रहालयचित्रों के माध्यम से चैरी चैरा कांडकी याद दिलाता है।
 -पतंजलि योगपीठ, हरिद्वार

कहानियां

जब बिस्मिल पर उनके साथी ने ही गोली चलाई

क्या ही लज्जत है कि रग-रग से यह आती है सदा।
दम न ले तलवार जब तक जान बिस्मिलमें रहे।

देश की स्वतंत्रता के लिए भारत मां के जिन  सपूतों ने अपना सर्वस्व निछावर किया, उनमें रामप्रसाद बिस्मिल का नाम स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में सोने के अक्षरों में अंकित है। उनकी पंक्तियां सर फरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है जोर कितना बाजुए कातिल में है।तो स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान जन-जन को आजादी के लिए मर-मिटने की प्रेरणा देती ही रही हैं। आज भी इन पंक्तियों से हमें इस धरती की गरिमा और गौरव की रक्षा के लिए तत्पर रहने की प्रेरणा मिलती है।

ऐसे स्वतंत्रता सेनानियों और शहीदों के अदम्य साहस और बलिदान की गाथा हमारी युवा पीढ़ी तक पहुँचनी चाहिए, जिससे देश के होनहार नौजवानों को यह पता चल सके कि देश की स्वतंत्रता यूँ ही नहीं मिली है। इसके लिए अनेक लोग  फांसी के तख्ते पर झूले हैं। अनेक माताओं से उनके कलेजे के टुकड़े शहीदी का बाना पहनकर सदा के लिए बिछुड़े हैं।

अनेक बहिनों का सुहाग छिना और बहुत-सी ऐसी प्रतिभाओं ने अपने प्राणों की आहुति दे डाली जो अभी जीवन के प्रांगण में पदार्पण कर ही रहे थे। भारत माँ के इन शहीदों ने समय की शिला पर अपना बलिदान अंकित कर देश को गुलामी की जंजीरों से मुक्त करने की नींव डाली। यदि ये बलिदान न होते तो पता नहीं सुनहरी स्वतंत्रता का क्या होता? पराधीनता की बेड़ियों में जकड़े हुए हमारे देश पर जब ब्रिटिश सरकार का दमन चक्र तीव्र गति से चल रहा था तब स्वतंत्रता की प्राप्ति के लिए देश के कोने-कोने में उथल-पुथल होने लगी और प्रत्येक नागरिक स्वाधीन सुबह में सांस लेने के लिए व्यग्र हो उठा।

दासता से मुक्त होने के लिए युवा वर्ग के मन में क्रान्ति करवट लेने लगी। आजादी की लड़ाई में होम होने वालों के मार्ग अलग होने पर भी लक्षित ज्योति एक ही थी। आजादी के दीवानों का एक वर्ग जहाँ असहयोग एवं अहिंसा के मार्ग पर चल कर विदेशी शासक से मुक्ति चाहता था, वहीं कुछ अति-उत्साही वीरों का वर्ग नरम दल की नरम नीति नर निर्भर न रह कर क्रान्तिकारी मार्ग पर चल कर उन्हें अपने देश से भगा देना चाहता था। पंडित रामप्रसाद बिस्मिल के जन्म दिन पर उनके एक संस्मण का यहां उल्लेख कर रहा हूँ जब उनके क्रांतिकारी मित्रों ने ही उनके साथ विश्वासघात किया उन पर प्राणघातक हमला किया। प्रयाग (इलाहाबाद) की एक धर्मशाला में दो-तीन दिन निवास करके विचार किया गया कि एक व्यक्ति बहुत दुर्बलात्मा है यदि वह पकड़ा गया तो सब भेद खुल जायेगा। अतः उसे मार दिया जाये। मैंने कहा मनुष्य-हत्या ठीक नहीं। पर अन्त में निश्चय हुआ कि कल चला जाये और उसकी हत्या कर दी जाये।

मैं चुप हो गया। हम लोग चार सदस्य साथ थे। हम चारों तीसरे पहर झाँसी का किला देखने गये। जब लौटे तब सन्ध्या हो चुकी थी। उसी समय गंगा पार करके यमुना तट पर गये। शौचादि से निवृत्त होकर मैं संध्या समय उपासना करने के लिये रेती पर बैठ गया। एक महाशय ने कहा- यमुना के निकट बैठो।मैं तट से दूर एक ऊँचे स्थान पर बैठा था। मैं वहीं बैठा रहा। वह तीनों भी मेरे पास ही आकर बैठ गये। मैं आँखें बन्द किये ध्यान कर रहा था। थोड़ी देर में खट से आवाज हुई। समझा कि साथियों में से कोई कुछ कर रहा होगा। तुरन्त ही एक फायर हुआ। मैं रिवाल्वर निकालता हुआ आगे को बढ़ा। पीछे फिर कर देखा, वह महाशय माउजर हाथ में लिये मेरे ऊपर गोली चला रहे हैं। कुछ दिन पहले मुझसे उनसे कुछ झगड़ा हो चुका था, किन्तु बाद में समझौता हो गया था। पिफर भी उन्होंने यह कार्य किया।

मैं भी सामना करने को प्रस्तुत हुआ। तीसरा फायर करके वे भाग खड़े हुये। उनके साथ प्रयाग (इलाहाबाद) में ठहरे हुए दो दस्य और भी थे। वे तीनों भाग गये। मुझे देर इसलिये हुई कि मेरा रिवाल्वर चमड़े के खोल में रखा था।  यदि आध मिनट और उनमें कोई भी खड़ा रह जाता तो मेरी गोली का निशाना बन जाता। मैं बाल-बाल बच गया। मुझसे दो गज के फासले पर से माउजर पिस्तौल से गोलियाँ चलाई गईं और उस अवस्था में जबकि मैं बैठा हुआ था। मेरी समझ में नहीं आया कि मैं बच कैसे गया? पहला कारतूस फूटा नहीं। तीन फायर हुए। मैं गद्गद होकर परमात्मा का स्मरण करने लगा।

आनन्दोल्लास में मूझे मूर्छा आ गई। मेरे हाथ से रिवाल्वर तथा खोल दोनों गिर गये। यदि उस समय कोई निकट होता तो मुझे भली-भांति मार सकता था। मेरी यह अवस्था लगभग एक मिनट तक रही होगी कि मुझसे किसी ने कहा, ‘उठ’! मैं उठा। रिवाल्वर उठा लिया। खोल उठाने का स्मरण ही न रहा। मैं केवल एक कोट और एक तहमद पहने था। बाल बढ़ रहे थे। नंगे सिर, पैर में जूता भी नहीं। ऐसी हालत में कहाँ जाऊँ। अनेकों विचार उठ रहे थे। इन्हीं विचारों में निमग्न यमुना तट पर बड़ी देर तक घूमता रहा। ध्यान आया कि धर्मशाला चलकर ताला तोड़ सामान निकालूँ। फिर विचार धर्मशाला जाने से गोली चलेगी, व्यर्थ में खून होगा। अभी ठीक नहीं। अकेले बदला लेना ठीक नहीं। और कुछ साथियों को लेकर फिर बदला लिया जायेगा।
मेरे एक साधरण मित्र प्रयाग में रहते थे। उनके पास जाकर बड़ी मुश्किल से एक चादर ली, और रेल से लखनऊ आया। लखनऊ आकर बाल बनवाये। धेती, जूता खरीदे, क्योंकि रुपये मेरे पास थे। रुपये न भी होते तो मैं सदैव जो चालीस-पचास रुपये की सोने की अंगूठी पहने रहता था, उसे काम में ला सकता। वहाँ से आकर अन्य सदस्यों से मिलकर सब विवरण कह सुनाया। कुछ दिन जंगल में रहा। इच्छा थी कि संन्यासी हो जाऊँ। संसार कुछ नहीं। बाद को पिफर माता जी के पास गया। उनसे सब कह सुनाया। उन्होंने मुझे ग्वालियर जाने का आदेश किया।

थोड़े दिनों में माता-पिता सभी दादी जी के भाई के यहाँ आ गये। मैं भी वहीं आ गया। मैं प्रत्येक समय यही विचार किया करता कि मुझे बदला अवश्य लेना चाहिये, एक दिन प्रतिज्ञा करके रिवाल्वर लेकर शत्रु की हत्या करने की इच्छा से मैं गया भी, किन्तु सफलता नहीं मिली। इसी प्रकार की उधेड़-बुन में मुझे ज्वर आने लगा। कई महीने तक बीमार रहा। माता जी मेरे विचारों को समझ गईं। माताजी ने बड़ी सान्त्वना दीं। कहने लगीं, कि प्रतिज्ञा करो कि तुम अपनी हत्या की चेष्टा करने वालों को जान से न मारोगे। मैंने प्रतिज्ञा करने में आनाकानी किया तो वे कहने लगी कि मैं मातृ ऋण के बदले में प्रतिज्ञा कराती हूँ, क्या उत्तर है? मैंने कहा- मैं उनसे बदला लेने की प्रतिज्ञा कर चुका हूँ।माता जी ने मुझे बाध्य कर मेरी प्रतिज्ञा भंग कराई। अपनी बात श्रेष्ठ रखीं। मुझे भी सिर नीचा करना पड़ा। उस दिन से मेरा ज्वर कम होने लगा और मैं अच्छा हो गया।